जैसा की हम सब को ज्ञात है की भारत विविध धर्मो वाला देश है | जहाँ विभिन्न धर्म और भिन्न-भिन्न तरीके का रहन सहन देखने को मिलता है तथा अन्य भिन्न-भिन्न तरीके के धार्मिक पारंपरिक स्थल भी देखने को मिलते है |
हम यह नहीं जानते की इन विभिन्न धर्मों का उद्गम किस प्रकार हुआ है तथा ये धर्म व इन धर्म के ईश्वर, अल्लाह, GOD वास्तविक है भी या नहीं |
इस रूप के हमें कही भी स्पष्ट प्रमाण नहीं मिलते | वैसे तो मानव भी पशु की भांति है| जब मानव विकास के दौर में कदम रख रहा था तो मानव के पास एक ही धर्म था वो सिर्फ प्राकृतिक धर्म था |
जिसके देवी-देवता हमारी प्राकृतिक संपदा थी जिनमे मुख्यतया: नदी, वृक्ष, पर्वत, कृषि आदि विशेष हैं |
तथा इस धर्म का उद्देश्य था सम्पूर्ण जीवन प्रक्रिया को सुचारू रूप से चलाना | ताकि जीवन प्रक्रिया ठीक से चल सके | वैसे तो पृथ्वी पर सभी जीवों ने अपना आकार-प्रकार बदला और विकास किया मगर मानव ने अपनी बुद्धि के कारण तेजी से विकास किया | जब मानव जीव विकास के दौर से उभर आया तो - उसने अपने हित की रक्षा व लालची मनोवृति के कारण दुर्बल प्राणियों पर अत्याचार करना शुरू कर दिया | अपने आप को श्रेष्ठ सिद्ध करने की होड़ में वह दुर्बल मानवों पर भी अत्याचार करने लगा | यहीं से उंच-नींच का भाव पैदा होने लगा और मानव जाति वर्गों में बटने लगी | स्वयं को उच्च वर्ग का घोषित करने हेतु मानव दुसरे मानव पर अत्याचार करने लगा, यहीं से वर्ण विशेष का जन्म हुआ | अपने-अपने कार्यों के हिसाब से जाति समूह बनने लगे तथा इसी दौरान कई धर्मों व जातियों का उद्भव हुआ जिसे आज हम वर्तमान में देख रहे हैं |
मेरा कहने का तात्पर्य यह है कि-हम आज भी प्राकृतिक धर्मं से ही बंधे हैं | यह बात अलग है कि-हम हमारे ईश्वर की पूजा-अर्चना करने की बजाय उसपर अत्याचार ही कर रहे हैं | मेरा अपना मानना है कि-ये चाँद, ये सूर्य, यानि प्रकृति ही समृद्ध और सर्व शक्तिशाली है | जोकि कण-कण में विराजमान है | और यदि ऐसा है तो आज के परिवेश में हम अपने ही ईश्वर की अवमानना कर रहे हैं | और अपने ईश्वर को बहुत पीड़ा दे रहे हैं | जो वृक्ष हमें जिन्दा रखे हुए हैं उनको हम काट रहे हैं , नदियों को प्रदूषित कर रहे हैं, सूर्य की धुप से बचकर आर्टिफीसियल क्रीम लगा कर हम रोगी बन रहे हैं | कुल मिलाकर हम जितना प्रकृति से भाग रहे हैं, उतना ही बड़ा दंड हम भोग भी रहे हैं, यदि ईश्वर की सेवा करनी है, और हम ईश्वर को मानते भी है तो अपने माता-पिता की सेवा, समाज में बुजुर्गों की सेवा और सबसे बड़ा प्रकृति के साथ किसी भी तरह कि छेड़छाड न करना और प्रकृति की देखभाल ही ईश्वर की सबसे बड़ी पूजा है |
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| || प्रकृति का सम्मान करें || |




